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mahabharat 3.129.11: हे भरतश्रेष्ठ! (इस कथा के अनुसार यहाँ केवल एक रात्रि ही रुकना चाहिए) अतः हम लोग आज रात्रि ही यहाँ रुकेंगे। युधिष्ठिर! यह तीर्थस्थान कुरुक्षेत्र का द्वार कहा गया है॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 3.129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.129.11 
अद्य चात्र निवत्स्याम: क्षपां भरतसत्तम।
द्वारमेतत् तु कौन्तेय कुरुक्षेत्रस्य भारत॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! (इस कथा के अनुसार यहाँ केवल एक रात्रि ही रुकना चाहिए) अतः हम लोग आज रात्रि ही यहाँ रुकेंगे। युधिष्ठिर! यह तीर्थस्थान कुरुक्षेत्र का द्वार कहा गया है॥ 11॥
 
O best of the Bharatas! (According to this legend one should stay here for only one night) therefore we will stay here only for tonight. Yudhishthira! This place of pilgrimage is said to be the gate of Kurukshetra.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)