श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 128: सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.128.20 
एष तस्याश्रम: पुण्यो य एषोऽग्रे विराजते।
क्षान्त उष्यात्र षड्रात्रं प्राप्नोति सुगतिं नर:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
यह उन्हीं राजा सोमक का पवित्र आश्रम है, जो आगे ही शोभायमान है। यहाँ क्षमापूर्वक छह रात्रि निवास करने से मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।
 
This is the holy hermitage of the same king Somaka which is looking beautiful just ahead. By staying here for six nights with forgiveness, a person attains the highest state.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)