श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 128: सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.128.15-16 
सोमक उवाच
पुण्यान्न कामये लोकानृतेऽहं ब्रह्मवादिनम्।
इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालये॥ १५॥
नरके वा धर्मराज कर्मणास्य समो ह्यहम्।
पुण्यापुण्यफलं देव सममस्त्वावयोरिदम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सोमक बोला - धर्मराज! मैं अपने वेद-ज्ञानी पुरोहित के बिना पवित्र लोकों में नहीं जाना चाहता। चाहे स्वर्ग हो या नरक - मैं उनके साथ कहीं भी रहना चाहता हूँ। हे देव! मेरे पुण्य कर्मों पर उनका भी उतना ही अधिकार है जितना मेरा। हम दोनों को इन शुभ-अशुभ कर्मों का समान रूप से फल मिलना चाहिए॥15-16॥
 
Somaka said - Dharamraj! I do not wish to go to the holy worlds without my Veda-knowledgeable priest. Be it heaven or hell - I wish to stay with him anywhere. O God! He has as much right on my good deeds as I do. Both of us should get the fruits of these good and bad deeds equally.॥15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)