श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 126: राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र  »  श्लोक d1h-3
 
 
श्लोक  3.126.d1h-3 
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमत:।
(सत्यकीर्तेर्हि मान्धातु: कथ्यमानं त्वयानघ।)
यथा मान्धातृशब्दश्च तस्य शक्रसमद्युते:।
जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
निष्पाप महर्षि! मैं आपसे उस यशस्वी एवं बुद्धिमान राजा मान्धाता का सम्पूर्ण वृत्तांत सुनना चाहता हूँ। इन्द्र के समान तेजस्वी एवं अतुलनीय पराक्रमी उस राजा का नाम 'मान्धाता' कैसे पड़ा? तथा उसके जन्म की कथा क्या है? आप मुझे बताइए; क्योंकि आप इन सब बातों को कहने में कुशल हैं।
 
Sinless Maharishi! I want to hear from you the whole story of that famous and wise King Mandhata. How did that king, who was as brilliant and incomparably mighty as Indra, get the name ‘Mandhata’? And what is the story of his birth? Tell me; Because you are skilled in telling all these things. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)