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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 126: राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.126.6 
अश्वमेधसहस्रं च प्राप्य धर्मभृतां वर:।
अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैरयजत् स्वाप्तदक्षिणै:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वह पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ था। उसने एक हजार अश्वमेध यज्ञ पूरे किए तथा अन्य महान यज्ञों द्वारा बहुत-सी दक्षिणा लेकर भगवान की पूजा की।
 
He was the best among the virtuous. He completed a thousand Ashwamedha sacrifices and worshipped God by performing other great sacrifices with a lot of dakshina. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)