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वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स कौन्तेयो लोमशेन महर्षिणा।
पप्रच्छानन्तरं भूय: सोमकं प्रति भारत॥ ४७॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- भारत! महर्षि लोमश के ऐसा कहने पर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने पुनः सोमक के विषय में पूछा। 47॥
Vaishampayanji says- India! After Maharishi Lomash said this, Kuntinandan Yudhishthir again asked about Somak. 47॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां मान्धातोपाख्याने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें मान्धातोपाख्यानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥