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mahabharat 3.126.40: महाराज! चारों ओर की पृथ्वी उनके यज्ञों के चैत्यों (दक्षिणा सहित) से भरी हुई थी; कहीं भी ऐसा स्थान नहीं था जो उनके यज्ञों से घिरा न हो ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 3.126: राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 126: राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.126.40 
तस्य चैत्यैर्महाराज क्रतूनां दक्षिणावताम्।
चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत् किंचिदनावृतम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! चारों ओर की पृथ्वी उनके यज्ञों के चैत्यों (दक्षिणा सहित) से भरी हुई थी; कहीं भी ऐसा स्थान नहीं था जो उनके यज्ञों से घिरा न हो ॥40॥
 
Maharaj! The earth all around was filled with the Chaityas (saints) of his sacrifices with Dakshina; there was no place anywhere that was not surrounded by his sacrifices. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)