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mahabharat 3.125.7-11: इन्द्र के ऐसा कहने पर भृगुपुत्र महामनस्वी च्यवन का क्रोध तत्काल ही शांत हो गया और उन्होंने उसी क्षण देवेन्द्र को समस्त दुःखों से मुक्त कर दिया। हे राजन! उस महाबली ऋषि ने स्वयं पूर्व में उत्पन्न किए हुए मद्य को चार स्थानों पर पृथक-पृथक वितरित कर दिया - मद्यपान, स्त्री, द्यूतक्रीड़ा और आखेट। इस प्रकार मद्यपान दूर करके उन्होंने देवराज इन्द्र तथा अश्विनीकुमारों सहित समस्त देवताओं को सोमरस से तृप्त कर दिया। तथा राजा शर्यात का यज्ञ पूर्ण करके, अपनी अद्भुत शक्ति को समस्त लोकों में प्रसिद्ध करके, वक्ताओं में श्रेष्ठ महाप्रतापी च्यवन ऋषि अपनी अभीष्ट पत्नी सुकन्या के साथ वन में विहार करने लगे। युधिष्ठिर! यह जो सरोवर पक्षियों के कलरव से गूंज रहा है और सुशोभित हो रहा है, वह महर्षि च्यवन का है।।7-11।।   |   mahabharat अध्याय 3.125: अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 125: अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 7-11
 
 
श्लोक  3.125.7-11 
एवमुक्तस्य शक्रेण भार्गवस्य महात्मन:॥ ७॥
स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरंदरम्।
मदं च व्यभजद् राजन् पाने स्त्रीषु च वीर्यवान्॥ ८॥
अक्षेषु मृगयायां च पूर्वसृष्टं पुन: पुन:।
तदा मदं विनिक्षिप्य शक्रं संतर्प्य चेन्दुना॥ ९॥
अश्विभ्यां सहितान् देवान् याजयित्वा च तं नृपम्।
विख्याप्य वीर्यं लोकेषु सर्वेषु वदतां वर:॥ १०॥
सुकन्यया सहारण्ये विजहारानुकूलया।
तस्यैतद् द्विजसंघुष्टं सरो राजन् प्रकाशते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के ऐसा कहने पर भृगुपुत्र महामनस्वी च्यवन का क्रोध तत्काल ही शांत हो गया और उन्होंने उसी क्षण देवेन्द्र को समस्त दुःखों से मुक्त कर दिया। हे राजन! उस महाबली ऋषि ने स्वयं पूर्व में उत्पन्न किए हुए मद्य को चार स्थानों पर पृथक-पृथक वितरित कर दिया - मद्यपान, स्त्री, द्यूतक्रीड़ा और आखेट। इस प्रकार मद्यपान दूर करके उन्होंने देवराज इन्द्र तथा अश्विनीकुमारों सहित समस्त देवताओं को सोमरस से तृप्त कर दिया। तथा राजा शर्यात का यज्ञ पूर्ण करके, अपनी अद्भुत शक्ति को समस्त लोकों में प्रसिद्ध करके, वक्ताओं में श्रेष्ठ महाप्रतापी च्यवन ऋषि अपनी अभीष्ट पत्नी सुकन्या के साथ वन में विहार करने लगे। युधिष्ठिर! यह जो सरोवर पक्षियों के कलरव से गूंज रहा है और सुशोभित हो रहा है, वह महर्षि च्यवन का है।।7-11।।
 
On Indra's saying this, the anger of Bhrigu's son, the great-minded Chyavana, was instantly pacified and he freed Devendra from all sorrows (at that very moment). O King! That powerful sage distributed the intoxication, which he had himself created earlier, separately in four places - drinking, women, gambling and hunting. Thus, by removing intoxication, he satisfied all the gods including Devraj Indra and the Ashwinikumaras with Somrasa. And having completed the sacrifice of King Sharyat, having made his wonderful power famous in all the worlds, the great Chyavana Rishi, the best among speakers, started roaming in the forest with his desirable wife Sukanya. Yudhishthira! This lake which is resonating with the chirping of birds and is being decorated, belongs to Maharishi Chyavana. 7-11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)