Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.125.25-26: राजन! यह महर्षिगणों द्वारा सेवित पुण्यमयी यमुना है, जिसके तट पर अनेक यज्ञ हुए हैं। यह पाप के भय को दूर करती है। कुन्तीनन्दन! यहीं पर महान धनुर्धर राजा मान्धाता ने स्वयं यज्ञ किया था। दानिशिरमणि सहदेवकुमार सोमकणे ने भी इसके तट पर यज्ञ का अनुष्ठान किया था। 25-26॥ | mahabharat अध्याय 3.125: अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
राजन! यह महर्षिगणों द्वारा सेवित पुण्यमयी यमुना है, जिसके तट पर अनेक यज्ञ हुए हैं। यह पाप के भय को दूर करती है। कुन्तीनन्दन! यहीं पर महान धनुर्धर राजा मान्धाता ने स्वयं यज्ञ किया था। दानिशिरमणि सहदेवकुमार सोमकणे ने भी इसके तट पर यज्ञ का अनुष्ठान किया था। 25-26॥
Rajan! This is the virtuous Yamuna served by Maharshigans on whose banks many yagyas have been performed. It drives away the fear of sin. Kuntinandan! It was here that the great archer King Mandhata himself performed the yagya. Danishiromani Sahadevkumar Somkane also performed the yagya ritual on its banks. 25-26॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥