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mahabharat 3.125.20: युधिष्ठिर, तुम उन सभी देवताओं और पितरों का तथा महान ऋषियों का भी पूजन करो, जिन्होंने इस अर्चिका पर्वत पर रहकर तपस्या की है।   |   mahabharat अध्याय 3.125: अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 125: अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.125.20 
इह नित्यशया देवा: पितरश्च महर्षिभि:।
आर्चीकपर्वते तेपुस्तान् यजस्व युधिष्ठिर॥ २०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर, तुम उन सभी देवताओं और पितरों का तथा महान ऋषियों का भी पूजन करो, जिन्होंने इस अर्चिका पर्वत पर रहकर तपस्या की है।
 
Yudhishthira, worship all those gods and ancestors, along with the great sages, who have performed penance while living on this Archika mountain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)