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mahabharat 3.124.13: लोमश कहते हैं - युधिष्ठिर! जब देवताओं के राजा इन्द्र बार-बार यही बात दोहराते रहे, तब भृगुपुत्र च्यवन ने उनकी उपेक्षा करके सोमरस का भाग अश्विनीकुमारों को देने के लिए ले लिया।   |   mahabharat अध्याय 3.124: शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 124: शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.124.13 
लोमश उवाच
एतदेव यदा वाक्यमाम्रेडयति देवराट्।
अनादृत्य तत: शक्रं ग्रहं जग्राह भार्गव:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
लोमश कहते हैं - युधिष्ठिर! जब देवताओं के राजा इन्द्र बार-बार यही बात दोहराते रहे, तब भृगुपुत्र च्यवन ने उनकी उपेक्षा करके सोमरस का भाग अश्विनीकुमारों को देने के लिए ले लिया।
 
Lomasha says - Yudhishthira! When the king of the gods Indra kept repeating the same thing again and again, then Bhrigu's son Chyavana ignored him and took the portion of Soma juice to give to the Ashwini Kumars.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)