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mahabharat 3.124.10-11: च्यवन बोले— माघवन! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े ही उत्साही और परम बुद्धिमान हैं। ये रूप और धन में भी श्रेष्ठ हैं। इन्होंने मुझे अमर बना दिया है और देवताओं के समान दिव्य रूप धारण किया है। देवराज! फिर आपके या अन्य देवताओं के अतिरिक्त इन्हें यज्ञ में सोमरस का भाग पाने का अधिकार क्यों नहीं है? पुरन्दर! इन अश्विनीकुमारों को भी देवता ही मानो।   |   mahabharat अध्याय 3.124: शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 124: शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.124.10-11 
च्यवन उवाच
महोत्साहौ महात्मानौ रूपद्रविणवत्तरौ।
यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवाजरम्॥ १०॥
ऋते त्वां विबुधांश्चान्यान् कथं वै नार्हत: सवम्।
अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि पुरंदर॥ ११॥
 
 
अनुवाद
च्यवन बोले— माघवन! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े ही उत्साही और परम बुद्धिमान हैं। ये रूप और धन में भी श्रेष्ठ हैं। इन्होंने मुझे अमर बना दिया है और देवताओं के समान दिव्य रूप धारण किया है। देवराज! फिर आपके या अन्य देवताओं के अतिरिक्त इन्हें यज्ञ में सोमरस का भाग पाने का अधिकार क्यों नहीं है? पुरन्दर! इन अश्विनीकुमारों को भी देवता ही मानो।
 
Chyavan said— Maghavan! These two Ashwinikumars are very enthusiastic and highly intelligent. They are also the best in beauty and wealth. They have made me immortal and have a divine form like the gods. Devraj! Then why do they not have the right to get a share of Som Rasa in the yagya except you or other gods? Purandar! Consider these Ashwinikumars as gods too.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)