(नाम्ना चाहं सुकन्यास्मि नृलोकेऽस्मिन् प्रतिष्ठिता।
साहं सर्वात्मना नित्यं पतिं प्रति सुनिष्ठिता॥ )
अथाश्विनौ प्रहस्यैतामब्रूतां पुनरेव तु।
कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ता गताध्वने॥ ५॥
भ्राजसेऽस्मिन् वने भीरु विद्युत्सौदामनी यथा।
न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भाविनि॥ ६॥
अनुवाद
'इस संसार में मेरा नाम सुकन्या के नाम से प्रसिद्ध है। मैं सदैव अपने पति के प्रति पूर्ण मन से निष्ठावान रहती हूँ।' यह सुनकर अश्विनीकुमार पुनः हँस पड़े और बोले - 'कल्याणी! तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह इस अति वृद्ध पुरुष के साथ कैसे कर दिया? तुम इस वन में विद्युत के समान चमक रही हो। भामिनी! देवताओं में भी हम तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री नहीं देख पा रहे हैं।'
'My name is famous in this world as Sukanya. I am always loyal to my husband with all my heart.' Hearing this, Ashwinikumars again laughed and said - 'Kalyani! How did your father marry you to this very old man? You are shining like lightning in this forest. Bhaamini! Even among the gods we are not able to see a beautiful woman like you.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)