श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 123: अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति  »  श्लोक 20-23
 
 
श्लोक  3.123.20-23 
यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने।
सा समीक्ष्य तु तान् सर्वांस्तुल्यरूपधरान् स्थितान्॥ २०॥
निश्चित्य मनसा बुद्धॺा देवी वव्रे स्वकं पतिम्।
लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं च वाञ्छितम्॥ २१॥
हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वच:।
यथाहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वित:॥ २२॥
कृतो भवद्भॺां वृद्ध: सन् भार्यां च प्राप्तवानिमाम्।
तस्माद् युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ।
मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
‘अथवा शोभने! तुम जिसे हृदय से चाहो, उसे अपना पति बना लो।’ देवी सुकन्या ने उन सबको समान रूप में खड़ा देखकर मन-बुद्धि से निश्चय करके उन्हें पतिरूप में स्वीकार कर लिया। योग्य पत्नी, यौवन और मनोवांछित रूप पाकर महाप्रतापी च्यवन ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए और दोनों अश्विनीकुमारों से बोले - ‘तुम दोनों ने मुझ वृद्ध पुरुष को सुन्दर और तरुण बना दिया है, तथा मुझे मेरी यह पत्नी भी मिल गई है; अतः मैं प्रसन्न होकर तुम दोनों को देवराज इन्द्र के समक्ष यज्ञ में सोमपान के योग्य बना दूँगा। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।’॥ 20-23॥
 
‘Or, Shobhane! Whomever you like from your heart, make him your husband.’ Goddess Sukanya, seeing them all standing in similar form, made up her mind and intellect and accepted him as her husband. The very illustrious sage Chyavan felt very happy on getting a suitable wife, youthful age and desired form and said to both Ashwinikumars – ‘You both have made me, an old man, beautiful and young, and I have also got this wife of mine; therefore, I will be pleased and will make both of you eligible to drink Soma in the yagya in front of Devraj Indra. I am telling you the truth.’॥ 20-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)