श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 123: अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति  »  श्लोक 12-14h
 
 
श्लोक  3.123.12-14h 
रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम्।
तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ॥ १२॥
युवानं रूपसम्पन्नं करिष्याव: पतिं तव।
ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम्॥ १३॥
एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे।
 
 
अनुवाद
'हे देवताओं! मैं अपने पति च्यवन मुनि पर अनन्य प्रेम करती हूँ, अतः आप मुझ पर ऐसा अनुचित संदेह न करें।' तब दोनों ने पुनः सुकन्या से कहा - 'शुभ! हम देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य हैं। हम तुम्हारे पति को युवा और मनोहर रूप से युक्त बना देंगे। तब तुम हममें से किसी को भी अपना पति बना सकती हो। इस शर्त के साथ कि यदि तुम चाहो तो अपने पति को यहाँ बुला सकती हो।'
 
'O Gods! I have complete love for my husband Chyavan Muni, so please do not have such unjustified suspicion about me.' Then both of them again said to Sukanaya - 'Shubh! We are the best physicians of the gods. We will make your husband young and endowed with a charming look. Then you can make any one of us your husband. With this condition, if you want, you can call your husband here.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)