श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 123: अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.123.1-2 
लोमश उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप।
कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम्॥ १॥
तां दृष्ट्वा दर्शनीयाङ्गीं देवराजसुतामिव।
ऊचतु: समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनाविदम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! कुछ समय पश्चात् जब सुकन्या स्नान कर चुकी थी, उस समय उसके शरीर के सभी अंग ढके हुए नहीं थे। इस अवस्था में दोनों अश्विनीकुमार देवताओं ने उसे देखा। देवराज इन्द्र की पुत्री के समान सुन्दर अंगों वाली उस राजकुमारी को देखकर नासत्य जानकर अश्विनीकुमार उसके पास गए और इस प्रकार बोले-॥1-2॥
 
Lomashji says- Yudhishthira! After some time when Sukanya had taken a bath, at that time all her body parts were not covered. In this state both Ashwinikumar gods saw her. Seeing that princess with beautiful body parts like the daughter of Devraj Indra, Ashwinikumars knowing Nasatya went to her and said this-॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)