Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.122.12-17: उसने उस शुभ राजकुमारी को पुकारा; परंतु वह (ब्रह्मर्षि की दुर्बल वाणी के कारण) उनकी वाणी सुन न सकी। उस छिद्र में मुनिवर च्यवन की चमकती हुई आंखें देखकर वह अत्यंत कौतुहल से भर गई। उसका मन मोह से भर गया और वह विवश होकर 'देखूं तो यह क्या है?' कहकर उसने उनमें एक कांटा चुभो दिया। उस कांटे से आंखें चुभ जाने के कारण अत्यंत क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यंत क्रोधित हो गए। तब उन्होंने शर्यातिकि की सेना का मल-मूत्र त्याग बंद कर दिया। मल-मूत्र त्याग द्वार बंद हो जाने के कारण समस्त सेना को कब्ज के कारण अत्यंत कष्ट होने लगा। सैनिकों की ऐसी दशा देखकर राजा ने सबसे पूछा- 'यहां वृद्ध महामना च्यवन रहते हैं जो सदैव तपस्या में तत्पर रहते हैं। वे स्वभाव से ही अत्यंत क्रोधी हैं। आज जाने-अनजाने में उनका किसने अनिष्ट किया है? जिस किसी ने भी ब्रह्मर्षि के प्रति अपराध किया हो, वह शीघ्र ही सब कुछ बता दे, विलम्ब न करे।' तब सब सैनिकों ने उनसे कहा - 'महाराज! हम नहीं जानते कि किसने उसके साथ अपराध किया है?'॥12-17॥ | mahabharat अध्याय 3.122: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तामाबभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै।
तत: सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी॥ १२॥
कौतूहलात् कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता।
किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने॥ १३॥
अक्रुध्यत्स तया विद्धे नेत्रे परममन्युमान्।
तत: शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत्॥ १४॥
ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदु:खितम्।
तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत् स पार्थिव:॥ १५॥
तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषत:।
केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मन:॥ १६॥
ज्ञातं वा यदि वाज्ञातं तद् द्रुतं ब्रूत मा चिरम्।
तमूचु: सैनिका: सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम्॥ १७॥
अनुवाद
उसने उस शुभ राजकुमारी को पुकारा; परंतु वह (ब्रह्मर्षि की दुर्बल वाणी के कारण) उनकी वाणी सुन न सकी। उस छिद्र में मुनिवर च्यवन की चमकती हुई आंखें देखकर वह अत्यंत कौतुहल से भर गई। उसका मन मोह से भर गया और वह विवश होकर 'देखूं तो यह क्या है?' कहकर उसने उनमें एक कांटा चुभो दिया। उस कांटे से आंखें चुभ जाने के कारण अत्यंत क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यंत क्रोधित हो गए। तब उन्होंने शर्यातिकि की सेना का मल-मूत्र त्याग बंद कर दिया। मल-मूत्र त्याग द्वार बंद हो जाने के कारण समस्त सेना को कब्ज के कारण अत्यंत कष्ट होने लगा। सैनिकों की ऐसी दशा देखकर राजा ने सबसे पूछा- 'यहां वृद्ध महामना च्यवन रहते हैं जो सदैव तपस्या में तत्पर रहते हैं। वे स्वभाव से ही अत्यंत क्रोधी हैं। आज जाने-अनजाने में उनका किसने अनिष्ट किया है? जिस किसी ने भी ब्रह्मर्षि के प्रति अपराध किया हो, वह शीघ्र ही सब कुछ बता दे, विलम्ब न करे।' तब सब सैनिकों ने उनसे कहा - 'महाराज! हम नहीं जानते कि किसने उसके साथ अपराध किया है?'॥12-17॥
He called out to that auspicious princess; but she (due to the weak voice of Brahmarshika) could not hear his voice. Seeing the shining eyes of Munivar Chyavan in that hole, she became very curious. Her mind was filled with fascination and she was helpless and saying, 'Let me see what is this?' she pierced them with a thorn. Due to the piercing of his eyes by that thorn, the very short-tempered Brahmarshi Chyavan became very angry. Then he stopped the excretion and urination of Sharyatiki's army. Due to the closing of the excretion and urination door, the entire army started suffering a lot due to constipation. Seeing such a state of the soldiers, the king asked everyone - 'Here lives the old Mahamana Chyavan who is always engaged in penance. He is very short-tempered by nature. Who has harmed him today, knowingly or unknowingly? Whoever has committed an offence against Brahmarshika, should tell everything immediately, do not delay. Then all the soldiers said to him - 'Maharaj! We do not know who has committed the offence against her?॥ 12-17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥