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mahabharat 3.122.1-2: लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन ऋषि अत्यंत तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवर के निकट तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासना में बैठे हुए ठूँठ के समान प्रतीत हो रहे थे। राजन! वे बहुत देर तक एक ही स्थान पर निश्चल बैठे रहे। 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 3.122: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 122: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.122.1-2 
लोमश उवाच
भृगोर्महर्षे: पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भारत।
समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युति:॥ १॥
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव।
अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशाम्पते॥ २॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन ऋषि अत्यंत तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवर के निकट तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासना में बैठे हुए ठूँठ के समान प्रतीत हो रहे थे। राजन! वे बहुत देर तक एक ही स्थान पर निश्चल बैठे रहे। 1-2॥
 
Lomashji says- Yudhishthir! Sage Chyavan was the son of Maharishi Bhrigu, who was very bright. He started penance near that lake. Pandunandan! The most brilliant Mahatma Chyavan looked like a stump while sitting in Veerasana. Rajan! He sat motionless at one place for a long time. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)