श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.121.9-10 
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारका:।
यथा वा वर्षतो धारा असंख्येया: स्म केनचित्॥ ९॥
तथैव तदसंख्येयं धनं यत् प्रददौ गय:।
सदस्येभ्यो महाराज तेषु यज्ञेषु सप्तसु॥ १०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! राजा गय ने सात यज्ञों में भाग लेने वालों को जो असंख्य धन दिया था, उसकी गणना नहीं की जा सकती, जैसे इस संसार में रेत के कणों, आकाश के तारों और वर्षा की धाराओं की गणना नहीं की जा सकती। ॥9-10॥
 
Maharaj! The innumerable wealth that King Gaya had given to the participants of the seven yagnas cannot be counted, just as one cannot count the grains of sand, the stars in the sky and the torrents of rain in this world. ॥9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)