नासत्यौ च कथं ब्रह्मन् कृतवान् सोमपीथिनौ।
एतत् सर्वं यथावृत्तमाख्यातु भगवान् मम॥ २४॥
अनुवाद
और हे ब्रह्म! आपने अश्विनीकुमारों को यज्ञ में भोजन कराने का अधिकारी किस प्रकार बनाया? कृपया ये सब बातें यथार्थ रूप से मुझे बताइये॥24॥
And Brahman! How did he make the Ashwini Kumars the right to offer food in the Yagya? Please tell me all these things realistically. 24॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)