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mahabharat 3.121.22-d2h: महाभाग! यहीं पर महातपस्वी भृगुनंदन भगवान च्यवन ने देवराज इन्द्र पर कुपित होकर यहीं पर इन्द्र को स्तब्ध किया था। इतना ही नहीं, मुनिवर च्यवन ने अश्विनीकुमारों को यज्ञ में सोम की आहुति देने का अधिकारी यहीं पर बनाया था। और यहीं पर उन्होंने राजकुमारी सुकन्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया था। 22॥   |   mahabharat अध्याय 3.121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 22-d2h
 
 
श्लोक  3.121.22-d2h 
चुकोप भार्गवश्चापि महेन्द्रस्य महातपा:।
संस्तम्भयामास च तं वासवं च्यवन: प्रभु:।
सुकन्यां चापि भार्यां स राजपुत्रीमवाप्तवान्॥ २२॥
(नासत्यौ च महाभाग कृतवान् सोमपीथिनौ।)
 
 
अनुवाद
महाभाग! यहीं पर महातपस्वी भृगुनंदन भगवान च्यवन ने देवराज इन्द्र पर कुपित होकर यहीं पर इन्द्र को स्तब्ध किया था। इतना ही नहीं, मुनिवर च्यवन ने अश्विनीकुमारों को यज्ञ में सोम की आहुति देने का अधिकारी यहीं पर बनाया था। और यहीं पर उन्होंने राजकुमारी सुकन्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया था। 22॥
 
Mahabhag! It was here that the great ascetic Bhrigunandan, Lord Chyavan, became angry with Devraj Indra and it was here that he stunned Indra. Not only this, Munivar Chyavan had made the Ashwini Kumars the officers of offering soma in the Yagya here. And it was at this place that he got Princess Sukanya as his wife. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)