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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ
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श्लोक 20
श्लोक
3.121.20
संधिरेष नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च।
एनमासाद्य कौन्तेय सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ २०॥
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! यह वैदूर्य पर्वत त्रेता और द्वापर के संधिकाल में प्रकट हुआ था। इसके निकट जाने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
O best of men! This Vaidurya mountain appeared at the junction of the Treta and Dvapara eras. By going near it a man becomes free from all sins.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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