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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.121.2 
इह देवै: सहेन्द्रैश्च प्रजापतिभिरेव च।
इष्टं बहुविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणै:॥ २॥
 
 
अनुवाद
यहाँ इन्द्र और प्रजापतियों सहित देवताओं ने अनेक प्रकार के बड़े-बड़े यज्ञों द्वारा प्रचुर दक्षिणा सहित भगवान की पूजा की है।
 
Here the gods including Indra and the Prajapatis have worshipped the Lord in various kinds of large sacrifices accompanied by abundant dakshina. 2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)