श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 16-18
 
 
श्लोक  3.121.16-18 
वैशम्पायन उवाच
स पयोष्ण्यां नरश्रेष्ठ: स्नात्वा वै भ्रातृभि: सह।
वैदूर्यपर्वतं चैव नर्मदां च महानदीम्॥ १६॥
(उद्दिश्य पाण्डवश्रेष्ठ: स प्रतस्थे महीपति:।)
समागमत तेजस्वी भ्रातृभि: सहितोऽनघ।
तत्रास्य सर्वाण्याचख्यौ लोमशो भगवानृषि:॥ १७॥
तीर्थानि रमणीयानि पुण्यान्यायतनानि च।
यथायोगं यथाप्रीति प्रययौ भ्रातृभि: सह।
तत्र तत्राददाद् वित्तं ब्राह्मणेभ्य: सहस्रश:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - निष्पाप जनमेजय! महाबली पाण्डवराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ पयोष्णी नदी में स्नान करके वहाँ से वैदूर्य पर्वत तथा महान् नर्मदा नदी के तट पर जाने के उद्देश्य से चल पड़े और वे तेजस्वी राजा सब भाइयों को साथ लेकर समय पर अपने गंतव्य पर पहुँचे। वहाँ भगवान लोमश मुनि ने उन्हें समस्त सुन्दर तीर्थों तथा पवित्र तीर्थस्थानों का परिचय कराया। तत्पश्चात् राजा ने अपनी सुविधा और प्रसन्नता के अनुसार सहस्रों ब्राह्मणों को धन दान दिया और भाइयों सहित उन सब स्थानों की यात्रा की। 16-18॥
 
Vaishampayanji says – Sinless Janamejaya! The great Pandava king Yudhishthir, along with his brothers, took a bath in the river Payoshni and set out from there with the aim of going to Mount Vaidurya and the banks of the great river Narmada, and that brilliant king reached his destination on time, taking all the brothers along with him. There Lord Lomash Muni introduced him to all the beautiful places of pilgrimage and holy places of worship. After that, the king donated money to thousands of Brahmins as per his convenience and happiness and traveled to all those places along with his brothers. 16-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)