श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.121.15 
तस्मात् त्वमत्र राजेन्द्र भ्रातृभि: सहितोऽच्युत।
उपस्पृश्य महीपाल धूतपाप्मा भविष्यसि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अतः हे राजन! अपने भाइयों सहित इसमें स्नान करने से तुम सब पापों से मुक्त हो जाओगे॥15॥
 
Therefore, O King! By taking a bath in it along with your brothers, you will be freed from all sins. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)