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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ
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श्लोक 11
श्लोक
3.121.11
भवेत् संख्येयमेतद्धि यदेतत् परिकीर्तितम्।
न तस्य शक्या: संख्यातुं दक्षिणा दक्षिणावत:॥ ११॥
अनुवाद
उपर्युक्त रेत आदि के कण तो कदाचित गिने जा सकते हैं, परन्तु राजा गय द्वारा दी गई दक्षिणा की गणना करना संभव नहीं है ॥11॥
The above mentioned grains of sand etc. can perhaps be counted, but it is not possible to count the dakshina given by King Gaya. ॥ 11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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