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mahabharat 3.121.1: लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा सुना जाता है कि इसी पयोष्णी नदी के तट पर राजा नृग ने यज्ञ करके देवताओं के राजा इन्द्र को सोमरस से तृप्त किया था। उस समय इन्द्र पूर्णतया संतुष्ट होकर आनन्द में मग्न हो गए थे॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 121: राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.121.1 
लोमश उवाच
नृगेण यजमानेन सोमेनेह पुरंदर:।
तर्पित: श्रूयते राजन् स तृप्तो मुदमभ्यगात्॥ १॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा सुना जाता है कि इसी पयोष्णी नदी के तट पर राजा नृग ने यज्ञ करके देवताओं के राजा इन्द्र को सोमरस से तृप्त किया था। उस समय इन्द्र पूर्णतया संतुष्ट होकर आनन्द में मग्न हो गए थे॥1॥
 
Lomashaji says - Yudhishthira! It is heard that on the banks of this river Payoshni, king Nriga performed a yajna and satisfied the king of gods Indra with Somras. At that time Indra was completely satisfied and immersed in joy.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)