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mahabharat 3.120.9: हे बलराम! मैं अपने उन उत्तम बाणों से शत्रुओं का सिर धड़ से अलग कर दूँगा जो सर्प, विष और अग्नि के समान भयंकर हैं। मैं रणभूमि में शत्रु सेना को रौंदकर अपनी तीक्ष्ण तलवार से उनके सिरों को काट डालूँगा।   |   mahabharat अध्याय 3.120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.120.9 
कायाच्छिर: सर्पविषाग्निकल्पै:
शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम।
खड्गेन चाहं निशितेन संख्ये
कायाच्छिरस्तस्य बलात् प्रमथ्य॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे बलराम! मैं अपने उन उत्तम बाणों से शत्रुओं का सिर धड़ से अलग कर दूँगा जो सर्प, विष और अग्नि के समान भयंकर हैं। मैं रणभूमि में शत्रु सेना को रौंदकर अपनी तीक्ष्ण तलवार से उनके सिरों को काट डालूँगा।
 
Lord Balarama, I will sever the head of the enemy from his body with my excellent arrows which are as dreadful as snakes, poison and fire. I will also trample the enemy army in the battlefield and chop off their heads with my sharp sword.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)