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mahabharat 3.12.88: 'हाय! हाय! मैं तो मर गया, इस अग्नि में मुझे शांति कैसे मिलेगी? मैं अपने छोटे-छोटे पुत्रों सहित अनाथ की भाँति नष्ट हो जाऊँगा।'॥88॥   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.12.88 
हा हतास्मि कुतो न्वद्य भवेच्छान्तिरिहानलात्।
अनाथा विनशिष्यामि बालकै: पुत्रकै: सह॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
'हाय! हाय! मैं तो मर गया, इस अग्नि में मुझे शांति कैसे मिलेगी? मैं अपने छोटे-छोटे पुत्रों सहित अनाथ की भाँति नष्ट हो जाऊँगा।'॥88॥
 
'Alas! Alas! I am dead, how can I find peace in this fire? I shall perish like an orphan along with my young sons.'॥ 88॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)