श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.12.50 
द्रौपद्युवाच
पूर्वे प्रजाभिसर्गे त्वामाहुरेकं प्रजापतिम्।
स्रष्टारं सर्वलोकानामसितो देवलोऽब्रवीत्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
द्रौपदी बोली - प्रभु! सृष्टि के प्रारम्भ में ऋषिगण आपको ही सम्पूर्ण जगत का रचयिता और प्रजापति कहते हैं। ऐसा महर्षि असित-देवल का मत है।
 
Draupadi said - Lord! At the beginning of the creation of the people, the sages call you alone as the creator and Prajapati of the whole world. This is the opinion of Maharishi Asit-Deval. 50.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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