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mahabharat 3.12.47: 'कुन्तीकुमार! तुम मुझसे अभिन्न हो और मैं तुमसे अलग नहीं हूँ। हे भरतश्रेष्ठ! हम दोनों में भेद नहीं जाना जा सकता।'॥47॥   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.12.47 
अनन्य: पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैव च।
नावयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'कुन्तीकुमार! तुम मुझसे अभिन्न हो और मैं तुमसे अलग नहीं हूँ। हे भरतश्रेष्ठ! हम दोनों में भेद नहीं जाना जा सकता।'॥47॥
 
'Kuntikumar! You are inseparable from me and I am not separate from you. O best of the Bharatas! The difference between us cannot be known.'॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)