श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.12.45 
ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव ते।
यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! तुम मेरे हो, मैं तुम्हारा हूँ। जो मेरे हैं, वे तुम्हारे हैं। जो तुमसे द्वेष करता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है। जो तुमसे मित्रता करता है, वह मुझसे भी मित्रता करता है॥ 45॥
 
‘Parth! You are mine, I am yours. Those who are mine are yours. Whoever hates you hates me too. Whoever is friendly to you is friendly to me too.॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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