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mahabharat 3.12.44: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! श्रीकृष्ण के अवतार पांडु नंदन अर्जुन महात्मा से इतना कहकर चुप हो गए। तब भगवान जनार्दन ने कुन्तीकुमार से इस प्रकार कहा-॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.12.44 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डव:।
तूष्णीमासीत् तत: पार्थमित्युवाच जनार्दन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! श्रीकृष्ण के अवतार पांडु नंदन अर्जुन महात्मा से इतना कहकर चुप हो गए। तब भगवान जनार्दन ने कुन्तीकुमार से इस प्रकार कहा-॥ 44॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Pandu Nandan Arjun, the incarnation of Shri Krishna, became silent after saying this to the Mahatma. Then Lord Janardan said to Kuntikumar thus -॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)