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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  3.12.39-40 
तं हन्तुमुद्यतौ घोरौ दानवौ मधुकैटभौ।
तयोर्व्यतिक्रमं दृष्ट्वा क्रुद्धस्य भवतो हरे:॥ ३९॥
ललाटाज्जातवाञ्छम्भु: शूलपाणिस्त्रिलोचन:।
इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी के जन्म के समय मधु और कैटभ नामक दो भयंकर राक्षस उन्हें मारने के लिए तत्पर थे। उनका अत्याचार देखकर क्रोध से भरे हुए श्रीहरि के ललाट से भगवान शंकर प्रकट हुए, जिनके हाथ में त्रिशूल था। उनके तीन नेत्र थे। इस प्रकार आपके शरीर से ब्रह्मा और शिव दोनों देवता उत्पन्न हुए।
 
When Brahma was born, two fierce demons Madhu and Kaitabh were ready to kill him. Seeing their cruelty, Lord Shankar appeared from the forehead of Shri Hari who was filled with anger and had a trident in his hand. He had three eyes. Thus, both the gods Brahma and Shiva were born from your body. 39-40.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)