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mahabharat 3.12.37: हे परंतप मधुसूदन! प्रलयकाल में आप समस्त तत्त्वों का नाश करके ब्रह्माण्ड को अपने भीतर ही धारण कर लेते हैं और अकेले रहते हैं॥37॥   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.12.37 
युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन।
आत्मनैवात्मसात् कृत्वा जगदासी: परंतप॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे परंतप मधुसूदन! प्रलयकाल में आप समस्त तत्त्वों का नाश करके ब्रह्माण्ड को अपने भीतर ही धारण कर लेते हैं और अकेले रहते हैं॥37॥
 
O Parantapa Madhusudan! During the time of dissolution, you destroy all elements and keep the universe within yourself and remain alone. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)