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mahabharat 3.12.105-106: क्रोध में भरे हुए उस बलवान राक्षस ने बड़े वेग से पास जाकर भीमसेन का हाथ पकड़ लिया। भीमसेन के हाथ का स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान था। उसका शरीर भी उतना ही बलवान था। राक्षस ने अचानक भीमसेन पर आक्रमण किया और उसका हाथ झटक दिया। 105-106   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 105-106
 
 
श्लोक  3.12.105-106 
तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता बली।
अगृह्णात् पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षस:॥ १०५॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रसंहननं दृढम्।
संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत् सहसा करम्॥ १०६॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में भरे हुए उस बलवान राक्षस ने बड़े वेग से पास जाकर भीमसेन का हाथ पकड़ लिया। भीमसेन के हाथ का स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान था। उसका शरीर भी उतना ही बलवान था। राक्षस ने अचानक भीमसेन पर आक्रमण किया और उसका हाथ झटक दिया। 105-106
 
That strong demon filled with anger went near with great speed and caught hold of Bhimasena's hand with his hand. The touch of Bhimasena's hand was like Indra's thunderbolt. His body was also as strong. The demon suddenly attacked Bhimasena and shook off his hand. 105-106.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)