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mahabharat 3.119.8: ये राजा युधिष्ठिर धर्म के पुत्र हैं। धर्म ही उनका आधार है। वे सदैव सत्य का आश्रय लेते हैं और दान देते रहते हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख का त्याग कर सकते हैं (परन्तु धर्म का त्याग नहीं कर सकते)। भला, धर्म से विमुख रहकर कोई कल्याण का भागी कैसे हो सकता है?॥ 8॥   |   mahabharat अध्याय 3.119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.119.8 
अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो
धर्मे धृत: सत्यधृति: प्रदाता।
चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो
धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
ये राजा युधिष्ठिर धर्म के पुत्र हैं। धर्म ही उनका आधार है। वे सदैव सत्य का आश्रय लेते हैं और दान देते रहते हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख का त्याग कर सकते हैं (परन्तु धर्म का त्याग नहीं कर सकते)। भला, धर्म से विमुख रहकर कोई कल्याण का भागी कैसे हो सकता है?॥ 8॥
 
This king Yudhishthira is the son of Dharma. Dharma is his foundation. He always takes shelter of truth and keeps giving charity. Kuntikumar Yudhishthira can give up his kingdom and pleasures (but he cannot give up Dharma). Well, how can someone be a part of prosperity by staying away from Dharma?॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)