श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.119.22 
जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये
सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते।
दुर्योधने चापि विवर्धमाने
कथं न सीदत्यवनि: सशैला॥ २२॥
 
 
अनुवाद
धर्मराज युधिष्ठिर अपनी पत्नी सहित जुए में हार गए और भाइयों तथा सेवकों सहित राज्य से निकाल दिए गए। उधर दुर्योधन (अधर्मी होते हुए भी) दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी स्थिति में पर्वतों सहित यह पृथ्वी क्यों नहीं फट जाती? ॥22॥
 
Dharmaraja Yudhishthira along with his wife were defeated in gambling and were expelled from the kingdom along with his brothers and servants. Meanwhile, Duryodhan (despite being unrighteous) is growing day by day. In such a situation, why does this earth along with the mountains not burst? ॥22॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां बलरामवाक्ये एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)