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mahabharat 3.119.21: धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनी आदि देवताओं के ये पुत्र, जो सुख भोगने में समर्थ होते हुए भी आज वन में भटक रहे हैं, किस प्रकार सब प्रकार के सुखों से वंचित हैं?॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.119.21 
त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य
देवेश्वरस्याप्यथवाश्विनोश्च।
एषां सुराणां तनया: कथं नु
वनेऽचरन् ह्यस्तसुखा: सुखार्हा:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनी आदि देवताओं के ये पुत्र, जो सुख भोगने में समर्थ होते हुए भी आज वन में भटक रहे हैं, किस प्रकार सब प्रकार के सुखों से वंचित हैं?॥ 21॥
 
How are these sons of gods like Dharma, Vayu, Indra and the Ashivins, who, in spite of being capable of enjoying pleasures, wandering in the forest today, deprived of all kinds of pleasures?॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)