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सत्रे समृद्धेऽतिरथस्य राज्ञो
वेदीतलादुत्पतिता सुता या।
सेयं वने वासमिमं सुदु:खं
कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा॥ २०॥
अनुवाद
राजा द्रुपद के समृद्ध यज्ञ में वेदी से प्रकट हुई, सुख भोगने में समर्थ यह सती-साध्वी द्रौपदी वनवास के इस महान दुःख को किस प्रकार सहन करती है?॥ 20॥
How does this sati-saadhvi Draupadi, who had appeared from the altar in the prosperous yagya of King Drupada, capable of enjoying happiness, bear this great sorrow of exile?॥ 20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥