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mahabharat 3.119.12: विचित्रवीर्यपुत्र धृतराष्ट्र और उनके पुत्र दुर्योधन आदि ये क्रूर कर्म करके (स्वप्न में) अपने पूर्वजों के देश में सुवर्ण के समान चमकते हुए फलते-फूलते वृक्ष अवश्य देख रहे हैं॥12॥   |   mahabharat अध्याय 3.119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.119.12 
नूनं समृद्धान् पितृलोकभूमौ
चामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान्।
विचित्रवीर्यस्य सुत: सपुत्र:
कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म॥ १२॥
 
 
अनुवाद
विचित्रवीर्यपुत्र धृतराष्ट्र और उनके पुत्र दुर्योधन आदि ये क्रूर कर्म करके (स्वप्न में) अपने पूर्वजों के देश में सुवर्ण के समान चमकते हुए फलते-फूलते वृक्ष अवश्य देख रहे हैं॥12॥
 
Vichitravirya's son Dhritarashtra and his son Duryodhana etc., after committing these cruel acts (in their dreams), are definitely seeing prosperous and flowering trees shining like gold in the land of their ancestors*॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)