श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 119: प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दु:खपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.119.10 
किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधान:
पितॄन् समागम्य परत्र पाप:।
पुत्रेषु सम्यक् चरितं मयेति
पुत्रानपापान् व्यपरोप्य राज्यात्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
पापी राजा धृतराष्ट्र परलोक में अपने पूर्वजों से कैसे कह सकेंगे कि, 'मैंने अपने पुत्रों तथा अपने भाई पाण्डु के पुत्रों के साथ न्याय किया है, जबकि उन्होंने इन निर्दोष पुत्रों को राज्य से वंचित कर दिया है?'
 
How will the sinful king Dhritarashtra be able to say to his ancestors in the next world, 'I have treated my sons and my brother Pandu's sons with justice, when he has deprived these innocent sons of the kingdom?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)