Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.118.23: युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर उन्हें कुछ सान्त्वना मिली, परन्तु पाण्डवों को अत्यन्त दुर्बल देखकर परम पूजनीय एवं श्रेष्ठ यादव योद्धा शोक और पीड़ा से पीड़ित होकर आँसू बहाने लगे॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 3.118: युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 118: युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.118.23 
श्रुत्वा तु ते तस्य वच: प्रतीता-
स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव।
नेत्रोद्भवं सम्मुमुचुर्महार्हा
दु:खार्तिजं वारि महानुभावा:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर उन्हें कुछ सान्त्वना मिली, परन्तु पाण्डवों को अत्यन्त दुर्बल देखकर परम पूजनीय एवं श्रेष्ठ यादव योद्धा शोक और पीड़ा से पीड़ित होकर आँसू बहाने लगे॥ 23॥
 
Hearing these words of Yudhishthira, they got some solace. But on seeing the Pandavas extremely weak, the most revered and noble Yadav warriors were afflicted with grief and pain and started shedding tears.॥ 23॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां प्रभासे यादवपाण्डवसमागमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यादव-पाण्डव-समागमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)