श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 118: युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना  »  श्लोक 11-13
 
 
श्लोक  3.118.11-13 
ततो वसूनां वसुधाधिप: स
मरुद्‍गणानां च तथाश्विनोश्च।
वैवस्वतादित्यधनेश्वराणा-
मिन्द्रस्य विष्णो: सवितुर्विभोश्च॥ ११॥
भवस्य चन्द्रस्य दिवाकरस्य
पतेरपां साध्यगणस्य चैव।
धातु: पितॄणां च तथा महात्मा
रुद्रस्य राजन् सगणस्य चैव॥ १२॥
सरस्वत्या: सिद्धगणस्य चैव
पुण्याश्च ये चाप्यमरास्तथान्ये।
पुण्यानि चाप्यायतनानि तेषां
ददर्श राजा सुमनोहराणि॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राजन! इसके बाद उन महात्मा नरेश ने वसु, मरुद्गण, अश्विनी कुमार, यम, आदित्य, कुबेर, इन्द्र, विष्णु, भगवान सविता, शिव, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, साध्यगण, धाता, पितृगण, रूद्र सहित उनके अनुयायी, सरस्वती, सिद्ध समुदाय तथा अन्य पुण्यात्मा देवताओं के परम पवित्र एवं सुन्दर मन्दिर देखे। 11-13॥
 
Rajan! After that, that Mahatma Naresh saw the most holy and beautiful temples of Vasu, Marudgana, Ashwini Kumar, Yama, Aditya, Kuber, Indra, Vishnu, Lord Savita, Shiva, Moon, Surya, Varun, Sadhyagana, Dhata, Pitrugana, Rudra along with his followers, Saraswati, Siddha Samudaya and other virtuous deities. 11-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)