श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 118: युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.118.1 
वैशम्पायन उवाच
गच्छन् स तीर्थानि महानुभाव:
पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा।
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि
क्वचित् क्वचिद् भारत सागरस्य॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! आगे चलकर, महापुरुष राजा युधिष्ठिर ने समुद्रतट पर स्थित समस्त पवित्र तीर्थों का दर्शन किया। वे सभी तीर्थ अत्यंत सुन्दर थे। कहीं-कहीं ब्राह्मणों ने भी उनमें निवास किया था, जिससे उन तीर्थों की शोभा बढ़ गई थी॥1॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Going ahead, the noble king Yudhishthira visited all the holy pilgrimage places on the seashore. All those pilgrimage places were extremely beautiful. At some places Brahmins resided in them, which added to the beauty of those pilgrimage places.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)