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mahabharat 3.117.11: तत्पश्चात्, यशस्वी जमदग्नि कुमार ने महान यज्ञ करके इन्द्रदेव को संतुष्ट किया और ऋत्विजों को दक्षिणा के रूप में भूमि प्रदान की ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.117.11 
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्य: प्रतापवान्।
तर्पयामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्य: प्रददौ महीम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, यशस्वी जमदग्नि कुमार ने महान यज्ञ करके इन्द्रदेव को संतुष्ट किया और ऋत्विजों को दक्षिणा के रूप में भूमि प्रदान की ॥11॥
 
Thereafter, the glorious Jamadagni Kumar performed a great yagya and satisfied Lord Indra and gave land to the Ritwijas in the form of Dakshina. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)