श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 116: पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या  »  श्लोक 27-29
 
 
श्लोक  3.116.27-29 
असकृद् रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत्।
कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर॥ २७॥
पीडयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमा:।
अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते॥ २८॥
समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दन:।
स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तथा मृत्युवशं गतम्।
अनर्हन्तं तथाभूतं विललाप सुदु:खित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! वे महामुनि अनत की भाँति 'राम! राम!!' का जप कर रहे थे, तभी कार्तवीर्य के पुत्रों ने बाणों से उन्हें घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनि को मारकर वे शत्रुसंहारक क्षत्रिय जिस मार्ग से आए थे, उसी मार्ग से लौट गए। जमदग्नि के इस प्रकार मारे जाने पर जब कार्तवीर्य के पुत्र भाग गए, तब भृगुनंदन परशुराम हाथ में लकड़ियाँ लेकर आश्रम में आए। अपने पिता को ऐसी दयनीय अवस्था में मरते देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जाने के योग्य कदापि नहीं थे, परशुराम उन्हें स्मरण करके विलाप करने लगे। 27-29।
 
Yudhishthira! He was chanting 'Rama! Rama!!' like a great sage Anath, when the sons of Kartavirya Arjuna wounded him with arrows and killed him. After killing the sage in this manner, those enemy-killing Kshatriyas returned the same way they had come. After Jamadagni was killed in this manner, when the sons of Kartavirya fled, Bhrigu Nandan Parashurama came to the ashram with firewood in his hands. He was very sad to see his father die in such a pitiable condition. His father was never worthy of being killed in this manner, Parashurama started lamenting remembering him. 27-29.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने जमदग्निवधे षोडशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानमें जमदग्निवधविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)