श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 116: पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.116.15 
ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मन:।
कोपोऽभ्यगच्छत् सहसा प्रसन्नश्चाब्रवीदिदम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इससे महात्मा जमदग्नि का क्रोध सहसा शांत हो गया और वे प्रसन्न होकर बोले-॥15॥
 
Maharaj! With this the anger of Mahatma Jamadagni suddenly subsided and he said happily -॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)