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mahabharat 3.115.9: अकृतव्रण ने कहा-भरतकुलभूषण नृप्रेस्त्र युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजी की कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं तुम्हें उसका वर्णन करूंगा। 9॥   |   mahabharat अध्याय 3.115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.115.9 
अकृतव्रण उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम्।
भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अकृतव्रण ने कहा-भरतकुलभूषण नृप्रेस्त्र युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजी की कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं तुम्हें उसका वर्णन करूंगा। 9॥
 
Akritavran said – Bharatkulbhushan Nriprestra Yudhishthir! The story of Bhriguvanshi Parshuramji is very big and excellent, I will describe it to you. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)