श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.115.34 
सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात्।
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार स:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
सत्यवती ने अपने और अपनी माता के लिए पुत्र प्राप्ति का उद्देश्य रखकर अपने श्वसुर को प्रसन्न किया, तब भृगुजी ने उन पर कृपा दृष्टि डाली ॥34॥
 
Satyavati pleased her father-in-law by keeping the aim of getting a son for herself and her mother. Then Bhriguji looked at him kindly. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)